मीमांशा दर्शन
मीमांसा या पूर्वमीमांसा दर्शन हिन्दुओं के छः दर्शनों में से एक है जिसमें वेद के यज्ञपरक वचनों की व्याख्या बड़े विचार के साथ की गयी है।
इसके प्रणेता जैमिनी हैं। मीमांसा का तत्वसिद्धान्त विलक्षण है । इसकी गणना अनीश्वरवादी दर्शनों में है । किसी विषय पर गहराई से किए गये
विचार-विमर्श को मीमांसा कहते हैं (मीमांसनं मींमांसा )। मीमांसा दर्शन में “धर्म क्या है” इस विषय पर मीमांसा की गई है । इसके अनुसार “चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः” अर्थात् वेद-वाक्य से लक्षित अर्थ, धर्म है ।
वेद ने जिन कर्मों को करने के लिये कहा है, उनको करना और जिनको करने से मना किया है, उनको न करना “धर्म” है। श्रौतसूत्र आदि कर्मकाण्ड के ग्रन्थों के वाक्यों को लेकर मीमांसा में पर्याप्त मात्रा में कर्म
मीमांसा की गई है, साथ में इन्हीं वाक्यों पर भाषाविज्ञान के सिद्धान्तों पर भी गहराई से विचार-विमर्श किया गया है।
इस शास्त्र काे ‘पूर्वमीमांसा’ और वेदान्त काे ‘उत्तरमीमांसा’ भी कहा जाता है। पूर्वमीमांसा में धर्म का विचार है और उत्तरमीमांसा में ब्रह्म का। अतः पूर्वमीमांसा काे धर्ममीमांसा और उत्तर मीमांसा
काे ‘ब्रह्ममीमांसा’ भी कहा जाता है।
पूर्वमीमांसा के सूत्र जैमिनि के हैं और भाष्य शबर स्वामी का है। जैमिनि द्वारा रचित सूत्र हाेने से पूर्वमीमांसा काे ‘जैमिनीय धर्ममीमांसा’ कहा जाता है। मीमांसा पर कुमारिल भट्ट के ‘तन्त्रवार्तिक’ और
‘श्लोकवार्तिक’ भी प्रसिद्ध हैं । मध्वाचार्य ने भी ‘जैमिनीय न्यायमाला विस्तार’ नामक एक भाष्य रचा है । मीमांसा शास्त्र में यज्ञों का विस्तृत विवेचन है, इससे इसे ‘यज्ञविद्या’ भी कहते हैं ।
बारह अध्यायों में विभक्त होने के कारण यह मीमांसा ‘द्वादशलक्षणी’ भी कहलाती है। इस शास्त्र का ‘पूर्वमीमांसा’ नाम इस अभिप्राय से नहीं रखा गया है कि यह उत्तरमीमांसा से पहले बना ।
‘पूर्व’ कहने का तात्पर्य यह है कि कर्मकांड मनुष्य का प्रथम धर्म है ज्ञानकांड का अधिकार उसके उपरान्त आता है।
Submit your review | |
best book for philosophy.
Other Books From - Hinduism
Other Books By - आचार्य उदयवीर शाश्त्री
Back

SHRIMAD BHAGVADGITA SADHAK SANJEEVANI
योग दर्शन
Jnana Yoga
Raj Yoga
न्याय दर्शन