ज्योतिष के मूल सिद्धांत
आज के समय में प्रत्येक मानव जीवन की जटिलताओं से परेशान एवं भावी जीवन की असुरक्षाओं से विचलित है। ऐसी अवस्था में ज्योतिषीय ज्ञान ही भविष्य की राह में मार्ग दर्शन कर सकता है। वस्तुतः अन्य विभिन्न विषयों जैसे हस्त विज्ञान, सामुद्रिक विज्ञान, विज्ञान और अंग विज्ञान आदि भी मार्ग दर्शन करते आये हैं, परन्तु जितना गणितीय सूक्ष्म अध्य्यन एवं तार्किक स्पष्टीकरण ज्योतिष शास्त्र में सम्भव है आज के समय में अन्य किसी भी शास्त्र में सम्भव नहीं है।
ज्योतिष शास्त्र के अन्तर्गत सम्पूर्ण ब्रह्माणीय स्थिति एवं उसमें उपस्थित ऊर्जाओं का अध्य्यन किया जाता है, इन ऊर्जाओं का सम्पूर्ण जड एवं चेतन जगत पर सदैव प्रभाव विद्यमान रहता है। ज्योतिषीय गणना के अन्तर्गत सम्पूर्ण 27 (सत्ताइस) नक्षत्रों में 108 (एक सौ आठ) पद होते हैं। जिनमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का समावेश है और प्रत्येक प्राणी का पद इन्हीं में से एक होता है। ऐसे में यदि कोई भी जीव अपने इष्ट को स्मरण करते हुए 108 मनकों द्वारा प्रार्थना करता है तो व्यक्ति विशेष का तो भला होता ही है साथ ही वह व्यक्ति सम्पूर्ण विश्व के कल्याण की भी कामना कर लेता है।
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